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काशी मथुरा पर जो औरंगजेब ने किया क्या वहीं सरकारें भी करना चाहती है, तो फिर दोनों में फर्क क्या रह जाएगा- बोले इतिहासकार इरफान हबीब



कानपुर। अयोध्या में राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद से ही काशी, मथुरा की जन्मभूमि की जमीन को मुक्त कराने की बात शुरु हो गई थी। हर कोई काशी मथुरा के मुद्दों पर अपने विचार दे रहा है। और मंदिर मस्जिद की  बयानबाजी तब और तेज हो गई जब वाराणसी की जिला कोर्ट ने ज्ञानवापी में व्यास जी के तहखाने में श्रृंगार गौरी की पूजा का आदेश दिया। इसके बाद से ही हिंदू पक्ष की ओर से जल्द ही काशी में ज्ञानवापी को मुक्त कराने का आश्वासन दिया जाने लगा। 

इसी बीच देश के नामचीन इतिहासकारों में शामिल होने वाले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर इरफान हबीब ने एक बार फिर ज्ञानवापी और मथुरा को लेकर बयान दिया है। इरफान हबीब ने कहा कि भले ही 300 साल पहले औरंगजेब ने काशी, मथुरा में मंदिरों को तोड़कर वहां पर मस्जिदों को बनाया था लेकिन अब पिछले 300 सालों से वहां पर मस्जिद बनी हुई है। तो क्या अब उसे तोड़कर वापस से मंदिर बनाया जाएगा? वो भी तब जब देश में संविधान लागू है। प्रोफेसर हबीब ने कहा कि अगर मस्जिद को तोड़कर मंदिर बनाया जाता है तो यह बहुत ही गलत और दुर्भाग्यपूर्ण होगा। क्योंकि संविधान होने के बाद भी हम लोग इस प्रकार की चीज करेंगे तो औरंगजेब और सरकार में क्या फर्क रह जाएगा। कुछ लोग ताजमहल को लेकर भी उल्टी सीधी बयानबाजी करते है। यब सब फिजूल और फालतू की बातें है। 

गौरतलब है कि काशी में ज्ञानवापी और मथुरा में शाही ईदगाह का केस कोर्ट में चल रहा है।हाल ही में ज्ञानवापी में ASI सर्वे के बाद वाराणसी जिला कोर्ट का एक फैसला भी आया है। जिसमें ज्ञानवापी की जगह बड़ा हिंदू मंदिर होने के प्रमाण मिलने का दावा, ASI रिपोर्ट में किया गया है। इसी रिपोर्ट के आधार पर ज्ञानवापी के तहखाने में कोर्ट की ओर से हिंदू पक्ष को पूजा की अनुमति दे दी गई। 

इनसबके बीच इतिहासकार इरफान हबीब का बयान सामने आया है। जिसमें उन्होंने ये कहा कि औरंगजेब ने जो किया उसे 300 साल बाद दुरूस्त करने का कोई औचित्य नहीं है। 1947 की स्थिति बरकरार रखनी होगी। अगर कोई तब्दीली करनी है तो सबसे पहले 1991 में लाया गया पूजा स्थल अधिनियम के कानून को बदलना होगा।  

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